आखिर, ये डी कम्पनी जैसी कम्पनियां कब तक चलेंगी

After all, how long will companies like D Company run?

राकेश दुबे।सरकारों के दावे आते रहे, पर इन २४ सालों में उस नेटवर्क को भी नेस्तनाबूद नहीं किया जा सका, जो आज भी दुबई और कराची से सक्रिय है और कभी नकली नोट तो कभी किसी और संदर्भ में जिसका जिक्र होता रहता है।१९९३ के मुंबई बम धमाके मामले में मुम्बई की टाडा कोर्ट ने अबू सलेम और मुस्तफा डोसा सहित छह आरोपियों को दोषी करार दिया। यह आरोपियों का दूसरा बैच है, जिस पर इस मामले में फैसला सुनाया गया है। इससे पहले १२३ आरोपियों का मुख्य मुकदमा २००६ में पूरा हो चुका है, जिसमें १०० आरोपी दोषी करार दिए गए थे। अब इस मामले में कोई आरोपी हिरासत में नहीं है, इसलिए तात्कालिक तौर पर माना जा सकता है कि यह इस मामले का अंतिम फैसला है | दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम, मोहम्मद डोसा और टाइगर मेमन सहित ३३ आरोपी आज भी फरार हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें इस मामले का मुख्य कर्ता-धर्ता कहा जा सकता है। जब तक ये कानून के फंदे से बाहर हैं तब तक यह नहीं माना जा सकता कि यह मामला अपनी तार्किक परिणति तक पहुंच गया है।

१९९३ में हुआ मुंबई सीरियल धमाका देश में अपनी तरह का पहला बड़ा आतंकी हमला था। इसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। तब दुनिया के अन्य किसी भी देश में आतंकवाद अपने मौजूदा स्वरूप में सामने नहीं आया था। करीब आठ साल बाद २००१ में अमेरिका में हुए ९/११ हमले की तुलना १९९३ के मुंबई हमले से की जा सकती है। अमेरिका उस हमले से कुछ वैसा ही विचलित हुआ, जैसा तब भारत हुआ था। मगर दोनों देशों की प्रतिक्रिया में अंतर साफ देखा जा सकता है। अमेरिका ने बौखलाहट में कौन-कौन से कदम उठाए और वे कितने सही या गलत थे, इस तरह के सवालों को फिलहाल छोड़ दें तो इतना साफ है कि आतंकी हमले के दोषियों को सजा देने में अमेरिकी हुकूमत काफी तत्पर रही। आखिर ओबामा के कार्यकाल में ओसामा बिन लादेन को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इसके उलट भारत में कभी इस तरह की बेचैनी नहीं दिखी। न तो तत्कालीन नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में, न ही बाद की सरकारों में इस बात को लेकर कोई संकल्प दिखा कि सभी दोषियों के गिरेबान तक

कानून का हाथ पहुंचे और वे सजा पाते हुए दिखें।

सरकारें आती रहीं जाती ररहीं उनके के दावे आते रहे,पर इन २४ सालों में उस नेटवर्क को भी नेस्तनाबूद नहीं किया जा सका, जो आज भी दुबई और कराची से सक्रिय है और कभी नकली नोट तो कभी किसी और संदर्भ में जिसका जिक्र होता रहता है। हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर इससे दुखद और क्षोभ टिप्पणी और क्या हो सकती है?

Related posts

Leave a Comment